मैथिली लिपि को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शामिल करने की मांग तेज, राज्यसभा में संजय झा ने उठाया मुद्दा
मैथिली भाषा और उसकी पारंपरिक लिपि को डिजिटल दुनिया में उचित पहचान दिलाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती नजर आ रही है। जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने इस मुद्दे को संसद के उच्च सदन में उठाकर इसे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि मैथिली भाषा की लिपि, साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शामिल किया जाए, ताकि यह समृद्ध भाषा आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सके।
डिजिटल युग में भाषा संरक्षण की जरूरत
आज का युग पूरी तरह डिजिटल होता जा रहा है। शिक्षा, संचार, प्रशासन, व्यापार और मनोरंजन—हर क्षेत्र में डिजिटल माध्यमों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में जिन भाषाओं की डिजिटल मौजूदगी मजबूत नहीं है, उनके सामने धीरे-धीरे हाशिए पर जाने का खतरा पैदा हो जाता है।
संजय झा ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैथिली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बावजूद डिजिटल माध्यमों पर इसकी लिपि का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है, जो चिंता का विषय है।
मैथिली: एक प्राचीन और समृद्ध भाषा
मैथिली केवल एक क्षेत्रीय भाषा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। इसका साहित्य, दर्शन, लोकगीत, नाटक और काव्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं।
विद्यापति जैसे महान कवियों की रचनाएं आज भी देश-विदेश में पढ़ी और सराही जाती हैं।
लेकिन बदलते समय में जब अधिकांश संवाद मोबाइल, कंप्यूटर और सोशल मीडिया के माध्यम से हो रहा है, तब मैथिली की लिपि का डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पिछड़ जाना इसकी निरंतरता के लिए चुनौती बन सकता है।
राज्यसभा में उठी ठोस मांग
राज्यसभा में मुद्दा उठाते हुए संजय झा ने कहा कि:
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मैथिली भाषा को गूगल कीबोर्ड,
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एंड्रॉयड और आईओएस सिस्टम,
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स,
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और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स
पर पूरी तकनीकी सुविधा के साथ उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इससे न केवल मैथिली भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि नई पीढ़ी भी अपनी मातृभाषा से सहज रूप से जुड़ पाएगी।
पुनौरा धाम के प्रमुख आकर्षण
प्रवासी मैथिली समाज को मिलेगा बड़ा सहारा
संजय झा ने यह भी रेखांकित किया कि देश और विदेश में बड़ी संख्या में मैथिली भाषी लोग रहते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मैथिली लिपि की उपलब्धता से:
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प्रवासी मैथिली समाज अपनी भाषा में संवाद कर सकेगा,
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बच्चों को मातृभाषा सिखाने में सुविधा होगी,
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और सांस्कृतिक जुड़ाव और मजबूत होगा।
यह कदम वैश्विक स्तर पर मैथिली की पहचान को और मजबूत करेगा।
साहित्य और शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मैथिली लिपि के शामिल होने से:
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ई-बुक्स,
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ऑनलाइन पाठ्यक्रम,
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डिजिटल लाइब्रेरी,
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और शोध कार्य
को नई गति मिलेगी।
शिक्षा जगत में भी मैथिली भाषा के अध्ययन और अध्यापन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे आने वाले समय में अधिक शोध और साहित्य सृजन संभव होगा।
तकनीक और संस्कृति का संगम
संजय झा ने कहा कि भाषा और तकनीक को आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ चलना चाहिए।
यदि तकनीक के माध्यम से भाषा को सशक्त किया जाए, तो यह सांस्कृतिक संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका बन सकता है।
उनका मानना है कि मैथिली को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थान दिलाना केवल एक भाषाई मांग नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और आत्मसम्मान का सवाल है।
सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया
मैथिली भाषा प्रेमियों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है।
उनका कहना है कि लंबे समय से यह मांग उठती रही है, लेकिन अब इसे संसद जैसे मंच पर मजबूती से रखा गया है, जिससे सकारात्मक परिणाम की उम्मीद जगी है।
कई संगठनों ने इसे मैथिली आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है।
आगे की राह
अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार के रुख पर टिकी हैं।
यदि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाती है, तो आने वाले वर्षों में मैथिली भाषा डिजिटल दुनिया में एक नई पहचान बना सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल मैथिली, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी डिजिटल समावेशन का मॉडल बन सकती है।
निष्कर्ष
मैथिली की लिपि को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शामिल करने की मांग समय की आवश्यकता है।
संजय झा द्वारा राज्यसभा में उठाया गया यह मुद्दा भाषा संरक्षण, सांस्कृतिक गर्व और तकनीकी समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यदि यह प्रयास सफल होता है, तो मैथिली भाषा आने वाली पीढ़ियों के लिए और अधिक जीवंत, सुलभ और वैश्विक बन सकेगी।
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